इंदौर के बारे में तो बाते चली रहेगी चलिए आज आपको इन्दोरी भाषा के बारे में बताते है एक अच्छे लेखक है जवाहर चौधरी उनका लेख आपको प्रस्तुत कर रहा हू वैसे इंदौर कि भाषाभी उसी तरह से अलग है जिस तरह से मुंबई कि वहा अपुन-तपुन चलता है तो यहाँ अलग ही स्टाइल चलती है कुछ खास सब्दो को विशेषकर “हे कि नी भिया ” ज्यादा बार बोला जाता है हे कि नी भिया तो फिर पढ़िए दो इन्दोरियो का वार्तालाप इन्दोरी स्टाइल में
‘वो क्या है भिया, आपने कभी राजनीती में जाने का सोची-नी, नी तो आज कि डेट में अपन को टिकिट हस के देते सारी पारटी वाले |’
‘नई यार !!’
‘अपने लिए कोई मुश्किल नी था भिया | आज देखो क्या माहोल चल रिया है ! जो देखो जो भगा चला-जा रिया है दिल्ली-भौपाल ! फिर भी किसी कि दाल नी-गल-री है | पन अपनी बात ठप्पे से होती | क्या…’
‘वा-यार पेलवान ! झाकी थी क्या तुमारी !!’
‘केने को तो सब केते रेते है, पन उस्ताद एक तेम पे अपना वो जलवा था कि पुछोई मत | वो हे न पनवारीलाल, जो बाद में मंत्री-यंत्री बन गया था, अपने हात-पैर दबाता था, क्या… |’
‘ऍ !! क्या केरे हो ! सई में !’
‘ हां-हां, वोई तो कर हू, उस टेम पे जलवा था अपना | आपने देखा नी उस्ताद, नी-तो आप भी बिस्वास नी करते, क्या…!’ ‘ एक बात हे यार, गलती कर दी तुमने | राजनीती में चले जाते तो आप कि तारीफ़ में फावड़े से माल खिंच रे होते | हे कि-नी?’
’वो क्या हे भिया, साली अपने मेई ईमानदारी हे | अपने को उसी टेम पे समज में आ गई थी आगे चलके कोई ईमानदारी से राजनीती नी कर सकता हे | और भिया फिरापने को क्या करना हे ! दाल रोटी उस टेम पे भी भगवान् देई रिया था, हे कि नी ?
‘देखो पेलवान, दाल रोटी तो मांगते भिकारियो को भी मिल जाती है | ऐसी इमानदारी जाए ताड़ी में | बेवकूफ समजते हे लोगबाग़ आज के जमाने में इमानदार को | आज कि डेट में तुमको कुछ मिल रिया हे क्या ईमानदारी का ?!’
‘नी मिले तो नी मिले यार, अब क्या करो जब खून मेई ईमानदारी हे तो !’
‘उस टेम पे तो कुछ कर लेते यार तो पनवारिलाल कि तरे ऐस करते ठप्पे से |… पता हे कि नी ! कित्ता माल बना लिया हे पठ्ठे ने !?… चार-चार तो बंगले हे इसी सैर में !… भोत सारी कालोनी हों में पलाट है ढेर सारे ! और केस!.. मने नगद तो इत्ता हे कि बस पुछोई मत ! … उदार लम्बे रूट पे बस ओन चल री हे उनका तो हिसाबी-नी हे !…. और भी भोत सारे उलटे-सिदे धंदे हे वो अलग | चुक गए पेलवान |’
‘अब क्या करो भिया | अपने को तो येई संतोस हे कि नेतागिरी में मु कला नी करा अपन ने | चायते तो कुछ भी कर सकते थे.. भिया तुम बिस्वास नी करोगे एक बार तो नेहरूजी से यु आमना-सामना हुआ, पाच-छे फुट कि दुरी से |’
‘नई यार !! क्या बात कर रियो हो !!’
‘हा, सई में | इदर कालेज के सामने से निकले थे | अपन तो बाप के कंदे पे बेठे थे तो अलग सेई दिखरे थे उनको | …. अपन को देखते सेई उन्ने गाड़ी मद्दी कराई और गेंदे का हार फेका मेरे उप्पर |…पन सेल दुसरे लोग होन ने झपट लिया |.. तबी से अपन को समज में आ गई कि राजनीती में येई होअगा यार |….माल अपने नाम पे आएगा और लुट लेंगे दुसरे लोग !.. बस अपना मन ऐसा खट्टा हो गया कि पूछो मत …. आज तक खट्ठाई हे.. चइए जब दी में जावन लगा लों |’
‘वा यार पेलवान ! ऐसी इमानदारी अगर नेता होन में आ जाये तो देस सुदर जाये क्या |’
‘देस कि किस्मत में जो लिखा होएगा वोई तो होएगा न भिया, अपन क्या कर सकते हे!?’
‘…फिर अबकी चुनाव में किसका काम क
रोगे?’
‘जो सई आदमी होता हे भिया अपन तो उसी का काम करते हे, क्या…|’
‘आज के टेम में कोई सई आदमी मिल्रिया हे क्या!?’
‘सई के रे हो भिया, पन करो क्या… हे कि नी?’
‘तुम बी यार, उस टेम पे लग लिए होते तो आज ये दिन नी देखना पड़ते |…पारसद-वारसद तो बनी जाते | कम से कम अल्फ़त्तुओ के झंडे-डंडे तो नी उठाना पड़ते |’
‘सई के रे भिया | पर करो क्या यार … ईमानदारी ने मरवा दिया |’
हा तो भिया समझ में आया…. बढ़िया लेख था | हे कि नी !!!
और अब देखिये इस मालवी इन्दोरी भाषा को दुनिया भर में फ़ैलाने वाले राजीव नेमा जी का एक विडियो

