Archives for
राजा महाराजा
मल्हार राव होलकर मालवा के प्रथम शासक थे

| आप खंडुजी होलकर के पुत्र थे | आपका जन्म १६ मार्च १६९३ को रामनवमी के दिन पुन के पास होलगाव में धनघर ( चरवाहे ) परिवार में हुआ, परन्तु आपका लालन पालन आपके मामा भोजिराजराव बरगल के पास तलोदी में हुआ |
मल्हार राव होलकर होलकर राजवंश के पहले राजकुमार थे जिन्होंने इंदौर पर शासन किया वे उन अधिकारियो में शामिल थे जिन्होंने उत्तरी भारत में मराठा राजवंश को फेलाने में योगदान दिया था और इसी बात से खुश होकर पेशवाओ ने उन्हें इंदौर राज्य की बागडोर दे दी थी | आपकी शादी बाद में अपने चाचा कि पुत्री गौतमा बाई ( मृत्यु २९ सितम्बर, १७६१) से सन १७१७ में हुई इसके अतिरिक्त आपकी शादी बाना बाई होलकर, द्वारका बाई साहिब होलकर, हरकू बाई साहिब होलकर और एक खांडा रानी से भी उनका विवाह हुआ आप एक राजपूत राजकुमारी थी एक चरवाहा परिवार से होते हुए भी मल्हार राव होलकर ने खांडा रानी से विवाह के समय स्वयं कि मौजूदगी दर्ज करने के लिए अपनी तलवार भेजी थी |आप १७२४ में पेशवाओ के द्वारा नियुक्त उन तीन सरदारों में शामिल थे जिन्हें मालवा कि जमीन से राजस्व एकत्रित करने का काम सोपा गया था | १७२६ में आपको ५००० घुड़सवार सैनिको का कप्तान बना दिया गया और १७२८ में आपको ११ महलो कि जागीर दे दी गई | ३ अक्टूम्बर १७३० को आपको फौज का प्रमुख बना दिया गया २ नवम्बर १७३१ को आपको मालवा के दो बड़े क्षेत्र से पुरस्कृत किया गया | यही सब अनुदान गौतम बाई के होने वाले पुत्र को विरासत में मिला २० जनवरी १७३४ को इसमें इंदौर के अतिरिक्त ९ और गाव शामिल हो गए |
उनके बारे में कहा जाता है कि आप पानीपत कि तीसरी लड़ाई में भाग गए थे परन्तु यहाँ कई इतिहासकारों ने लिखा है कि सदाशिवराव भाऊ ने ही उनको ऐसा करने के लिए कहा था आपने मल्हार राव को पार्वतीबाई को बचाने का कार्य सोपा था जब विश्वासराव मारा गया तब सदाशिवराव भाऊ ने पराजय को महसूस किया तब आपके निर्देशानुसार मल्हार राव ने युद्ध क्षेत्र छोड़ा और पार्वतीबाई को बचाया | अगर आप युद्ध क्षेत्र से भाग गए होते तो पेशवा आपको सूबेदार कभी वापस नहीं करते |

आपने दिल्ली के मुगलों को अंग्रेजो से मुक्त कारवाने के कई प्रयास किये लेकिन सफलता हाथ नहीं आई मुग़ल शासक शाह आलम आपकी इस बहादुरी के कायल हो गए और आपने मल्हारराव को “
महाराजाधिराज राजराजेश्वर आलीजा बहादुर” कि उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया |
आपकी मृत्यु २० मई, १७६६ को आलमपुर में हुई और
अहिल्याबाई होलकर आपकी उत्तराधिकारी बनी | अहिल्या बाई होलकर को आपने शुरू से ही तलवारबाजी आदि का प्रशिक्षण दिया था इसी के फलस्वरूप
अहिल्याबाई होलकर ने एक पुत्र के समान धर्म निर्वाह किया | मल्हार राव का मकबरा और छतरी मध्यप्रदेश भिंड जिले, लहर तहसील के आलमपुर में स्थित है |
इस ब्लॉग कि पोस्ट और इंदौर कि जानकारी से अपडेट रहने के लिए फीड या फिर इ-मेल से सब्सक्राइब करना न भूले | क्या आपने फीड या ई-मेल से सब्सक्राइब किया | शासन
राजमाता अहिल्या बाई होलकर ! जी हाँ आज मै हमारे मालवा की महारानी के बारे में बताने जा रहा रहा हू | महारानी अहिल्या बाई होलकर, इनके परिचय के बिना इंदौर शहर का परिचय अधुरा ही कहा जायेगा | अहिल्या बाई अहिल्या बाई होलकर एक ऐसा नाम है जिसे आज भी हर भारत वासी बड़ी श्रद्धा से स्मरण करता है | वे एक महान शाहक और मालवा की रानी थी | इनका जन्म ३१ अगस्त, सन १७२५ में जामखेड के चौन्दी गाँव में हुआ था जो अभी महाराष्ट्र के अहमदनगर में है | उनके पिता मानकोंजी शिंदे गाँव के पाटिल थे, और वहा उनका अच्छा खासा रसूख था | उस समय लडकिया पढने नहीं जाती थी, मगर अहिल्याबाई के पिता ने उन्हें खुद पढाया और अच्छी शिक्षा दी |
इनका विवाह इंदौर राज्य के संस्थापक महाराज मल्हारराव होलकर के पुत्र खाडेराव से हुआ था | अपनी पुत्रवधू अहिल्याबाई को भी वह राजकाज की सिक्षा देते रहते थे | उनकी बुद्धि और चतुराई से वह बहुत प्रसन्न होते थे |
सन १७४५ में अहिल्या बाई के एक पुत्र हुआ और तीन वर्ष बाद एक कन्या | पुत्र का नाम मालेराव और कन्या का नाम मुक्तबाई रखा | उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने पति के गौरव को बढाया | कुछ ही दिनों में में अपने महान पिता के मार्गदर्शन में खाडेराव एक अच्छे सिपाही बन गए |
विवाह के २१ वर्ष बाद सन १७४५ में आपके पति खाडेराव एक युद्ध में शहीद हो गए | इसके १२ वर्ष बाद ससुर मल्हार राव भी सवर्ग सिधार गए | और उनके द्वारा तख़्त पर आसीन किये गए खाडेराव के एकलौते पुत्र मालेराव भी नहीं रहे | ५ अप्रेल, १७६७ को मालेराव का निधन हो गया | इतना सब कुछ होने के बाद भी अहिल्या बाई ने न सिर्फ राजकाज संभाला बल्कि फौजी मसलो पर भी खुद ही फैसले लिए | जब तक वे जीवित रही उन्होंने न सिर्फ मालवा पर राज किया अपितु यह कहना अतिश्योक्ति न होगी की उन्होंने साथ ही साथ प्रजा के दिलो पर भी राज़ किया | वे एक उदार रानी, एक ममतामई माँ, न्यायप्रिय और एक कुशल प्रशाशक थी | उनके न्याय का इतिहास गवाह है की उन्होंने अपने एकलौते बेटे तक के लिए मौत की सजा सुना दी | लोग उनकी पूजा करते है और वो सारी प्रजा को बच्चो की तरह मानती थी |

शासन की बागडोर जब अहिल्या बाई ने अपने हाथो में ली तब राज्य में बड़ी अशांति थी | ऐसी दशा में रजा का सबसे बड़ा कर्तव्य उपद्रव करने वालो को काबू में लाकर प्रजा को निर्भयता और शांति प्रदान करना है | उपद्रव में भीलो का खास हाथ था | उन्होंने दरबार में सभी दरबारियो, सरदारों और प्रजा का ध्यान इस और दिलाते हुए यह घोषणा की ” जो वीर पुरूष इन उपद्रवी लोगो को काबू में लावेगा, उसके साथ में उपनी पुत्री का विवाह कर दूंगी |” इस घोषणा को सुनकर यशवंतराव फणसे आए और बड़ी नम्रता से कहा की वे यह काम कर सकते है | यशवंतराव अपने कार्य में लग गए और बहुत थोड़े समय में आपने राज्य में शांति स्थापित कड़ी | महारानी ने बड़ी प्रसन्नता और बड़े समारोह में मुक्ताबाई का विवाह यशवंत राव फणसे के साथ कर दिया | राज्य में शांति और सुरक्षा की स्थापना होते ही व्यापार-व्यवसाय और कला-कौशल की बढोतरी होने लगी और लोगो को ज्ञान की उपासना का अवसर भी मिला | नर्मदा के तीर्थ पर महेश्वर उनकी राजधानी थी | वहा तरह तरह के कारीगर आने लगे | और शीघ्र ही वस्त्र निर्माण का वह एक सुन्दर केंद्र बन गया |
वास्तव में अहिल्याबाई किसी बड़े राज्य की रानी नहीं थी परन्तु अप]]
>