सन 1884 में ही इंदौर में हवा महल नामक मजबूत चट्टानी मोटी-मोटी
दीवारों के साथ बनवाना प्रारंभ हुआ | इस महलनुमा किले को महाराजा इतना ऊँचा बनाना चाहते थे कि उपरी मंजिल कि छत पर तोपे जमाकर के यही से अंग्रेजो कि महू स्थित छावनी को नेस्तनाबूत किया जा सके | अंग्रेज ए.जी.जी. व गुप्तचरो की सूचनाओ के आधार पर अधबीच में ही ब्रिटिश सरकार ने निर्माण कार्य रुकवा दिया | फिर भी जितनी इमारत बन चुकी थी वह आधुनिक इंदौर में अपनी शिल्प और सुदृढता के कारण आज भी सराही जाती है | अधूरी होने के कारण ही यह फुठी कोठी के नाम से भूल-भुलैया का नमूना बनी रही | इस दिव्य भव्य ईमारत के पुरे निर्माण की ऊंचाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके बचे हुए लाखो चट्टानी लाल पत्थरो से पुराना विशाल हाईकोर्ट भवन तोपखाना तथा वर्तमान एडवर्ड हाल (गाँधी हाल) बनाया गया |
Atal Bihari Vajpeyi Regional Park, Pipliyapala Park
- म्यूजिकल फाउंटेन : संगीत की लय पर फव्वारा डांस करता हुआ नजर आएगा।
- जंपिंग जैट फाउंटेन : पानी एक तरफ से निकलकर तीन-चार चरणों में जंप करता हुआ आगे बढ़ता दिखाई देखा।
- आर्टिस्ट विलेज : ग्रामीण परिवेश में तैयार किए गए स्थल पर लोक संस्कृतियों को दर्शाने के लिए तैयार किए गए प्लेटफार्म पर कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं।
- भूल भुलैया : सायकस बैंजामिन के पेड़ों की भूल-भुलैया का निर्माण।
- भारतीय शैली के उद्यान : इसमें अलग-अलग डिजाइन हैं जो ऊंचाई से देखने पर नैकलेस जैसा नजर आता है।
- फ्रेंच गार्डन : फ्रेंच स्टाइल के गार्डन है जिसमें भूल-भुलैया, रोज गार्डन आदि को शामिल किया गया है।
- जैव विविधता गार्डन : प्रवेश द्वार के बाद किनारे पर विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं।
- मिस्ट फाउंटेड : धुएं का आभास करवाने वाला फव्वारे से गरमी में सुकून मिलेगा। तापमान कम करने का भी काम करता है। बोटिंग की भी सुविधा है।
- फॉस्ट फूड जोन : जोन में छह रेस्टोरेंट हैं। इनमें अच्छी गुणवत्ता के खाद्य और पेय पदार्थ होंगे।
- लैक व्यू पॉइंट : तालाब में 60-70 फीट ऊंचा पानी उडा़ने वाले फाउंटेन लगाए गए हैं। यहां से तालाब का नजारा दिखेगा।
- बोटिंग : रीजनल पार्क से सटे पीपल्यापाला तालाब में बोटिंग की व्यवस्था भी की गई है।
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गाँधी हॉल
गाँधी हाल, इंदौर में रहने वालो के लिए यह
जाना पहचाना नाम है | गाँधी हाल का वास्तविक नाम किंग एडवर्ड (सप्तम) के नाम पर किंग एडवर्ड हॉल रखा गया था | इसे सन १९०४ में बनवाया गया था जब किंग एडवर्ड (सप्तम) (King Edward 7th) को राजा बनाया गया था | इसके उपर राजपुताना शैली में गुम्बद और मीनारे बनी हुई है | यह भवन सफ़ेद सिवनी और पाटन पत्थरो से बना है इसे इन्ड़ोगोथिक शैली में बनाया गया है | इसके भीतर की छत प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बनी है इसका फर्श काले और सफ़ेद संगमरमर से बना है इसमें बीच की मीनार चोकोर आकार में बनी है और उसके उपरी हिस्से में चारो और घडी है यहाँ बड़ी सी घडी होने के कारण इसे घंटाघर भी कहते है | १९४७ में देश स्वतंत्र होने के पश्चात् इसका नाम गाँधी हाल कर दिया गया | गाँधी हॉल साल भर विभिन्न आयोजनों का केंद्र बिंदु बना रहता है यहाँ वर्ष भर कई तरह के संस्कृतिक आयोजन होते रहते है | इस भवन का निर्माण मुंबई (बॉम्बे) के प्रसिद्द वास्तुकार (आर्किटेक्ट) स्टीवेंसन (Stevenson) की देखरेख में हुआ और इसकी निर्माण की लागत २.५० लाख रुपये थी और इसका उदघाटन नवम्बर, १९०५ में प्रिंस ऑफ़ वेल्स (जार्ज पंचम) / Prince Of Wales द्वारा किया गया था |






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मल्हार मार्तंड मंदिर

राजवाडे के पीछे के हिस्से में होलकर वंश के कुल देवता (मल्हारी मार्तंड – शिव ) का मंदिर है | इस मंदिर के भीतर जाने पर होलकर वंश के इतिहास को दर्शाते हुए बहुत से चित्र लगे हुए हैं | साथ ही अनेक दुर्लभ मूर्तियाँ विशेषकर कुलदेवता मल्हारी मार्तंड (शिव) के अनेक रूपों में मूर्तियाँ हैं | यहाँ शिव भगवान की एक बड़ी मूर्ति है |
जहा पर मल्हार मार्तंड भगवान जो की शिव भगवान का ही एक रूप है
के पास में काले पत्थर से बनी अहिल्या माता की मूर्ति भी रखी है | यह पर काफी तस्वीरे दी गई है जो की राजवाडा का इतिहास भी बताती है | मंदिर में प्रवेश करते ही सामने गणेश जी की मूर्ति है और बायीं और शिव जी की मूर्ति स्थापित है | दाई और अहाते में आपको बड़ा सा शिवलिंग नजर आएगा | इस मंदिर का अधिकांश भाग लकड़ी का बना है इसकी छत भी |











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छत्रीबाग की छत्रिया
१८ वी शताब्दी के आरम्भ से १९ वी शताब्दी के मध्य यह छत्रिया बने गयी है होलकर राज्य में छतरियो का निर्माण सन १७८० में प्राम्भ हुआ जब अहिल्याबाई होलकर ने आलमपुर जिला भिंड में अपने ससुर सूबेदार मल्हार राव होलकर की छत्रिया बनवाई थी |
जैसे ही आप परकोटे से प्रवेश करते है तो जो पहली छतरी आती है वो है कै. मल्हार राव होलकर (द्वितीय मृत्यु 1833 ) की छतरी है यह एक सादा सी छतरी है इसके बिलकुल सामने शिव भगवान का मंदिर है | इसके पड़ोस में कै. तुकोजीराव होलकर (द्वितीय जन्म सन 1835 , मृत्यु सन 1886 ) की छतरी है वही सामने अहिल्या बाई होल्कर की मूर्ति रखी गयी है जो की संगमरमर की बनी है व उनके हाथ में शिवलिंग है | इन छतरियो में की गयी नक्काशी को आप देख सकते है इनमे बेल बुटो और विभिन्न आकृतियों को उभारा गया है | इनके बहर की तरफ कृष्णपुरा की छतरियो की तरह मुर्तिया बने गयी है जिनके हाथ में बंदूके और हथियार भी है | परकोटे के चारो और भीतर से कुछ जगह भी बनाई गयी है जो की एक बरगी किसी ख़ुफ़िया रास्ते की तरह दिखती है पर यहाँ दरवाजे लगा दिये गये है |
इसी के पड़ोस में इंदिराबाई होलकर की समाधी है जो की चोकोर आकार में काले मार्बल से बनी है आपका जन्म ज्येष्ठ सुदी ९ शक 1896 को हुआ और मृत्यु 11 जून, 1896 को हुई | राजकन्या स्नेहलता राजे की छतरी के सामने महाराजा मल्हार राव होलकर की छतरी है इनका जन्म 16 मार्च, 1693 को हुआ व मृत्यु 20 मई, 1766 को हुई | आपका शासन काल सन 1731 से 1766 तक रहा | पुरे छत्रीबाग में आपकी छतरी में की गयी कारीगरी देखते ही बनती है, व यह छतरी काफी प्रसिद्द है इसमें परकोटे की तरह गुम्बद से कुछ मार्बल जोड़ी गयी है व उन पर कारीगरी की गयी है इसके दरवाजे पर कई तरह की डिज़ाइन बनाई गयी है | इसके खम्बो पर कई तरह की आक्रतिया उकेरी गयी है इसके अतिरिक्त मुंडेर पर तस्वीरे भी बनाई गयी है जिन्हें आप तस्वीरों में देख सकते है | इसके पड़ोस में राजमाता अहिल्या बाई होलकर ( जन्म 31 मई, 1725 / मृत्यु 13 अगस्त, 1795 शासनकाल 1767 -1795) और श्रीमंत खंडेराव होलकर ( जन्म 1723 निधन 24 मार्च, 1754) का समाधी स्थल बनाया गया है वैसे अहिल्या बाई होलकर की छत्रिया महेश्वर में स्थित है | यह मंदिर की शक्ल में बनाया गया है यह एक शिव मंदिर है व इसमें अहिल्या बाई और खंडेराव की मूर्ति भी है | यह समाधी सामान्य रूप में बनाई गयी है | पड़ोस में ही श्रीमंत मालेराव होलकर ( जन्म 1745 / निधन 17 मार्च, 1767 / शासनकाल 1766 -1767 ) की छतरी है इसमें की गयी नक्काशी देखने लायक है यहाँ पर नक्काशी बड़ी बारीक़ है इसमें फूलो को भी छत्री को भीतर से देखने पर देखा जा सकता है | यहाँ इस छतरी की दीवार में एक गणेश मंदिर भी बनाया गया है |
इसके अतिरिक्त छत्रीबाग में अभी सुधार कार्य चल रहा है जिसे पुरातत्व विभाग के द्वारा कराया जा रहा है इसमें निचे मार्बल लगाये गये है व साफ़ सफाई की जा रही है और बगीचा भी बनाया गया है इस कारण से इसमें अभी जनता का प्रवेश बंद है | इसे कुछ समय बाद खोल दिया जाएगा और शुल्क भी लिया जाएगा परन्तु जब भी आप जायेंगे आपको यह जगह जरुर पसंद आएगी | यह तो रही छत्रीबाग की छतरियो की , यहाँ इसी जगह के पास में सूबेदार की छत्रिया भी है जो वेंकटेश भगवन के मंदिर के पास वाली गली में भी कुछ छत्रिया है यहाँ एक बावड़ी भी है और पास में खान नदी पर पुलिया है | इन छतरियो में भी समाधी भी है और शिव मंदिर भी है यहाँ छोटे से कुए बनाये गये है और चोकोर से पत्थर रखे गये है | इस छतरी के चित्र आप निचे देख सकते है |
रही बात यहाँ तक पहुचने की तो आपने इंदौर कलेक्टर ऑफिस तो देखा ही होगा पुराना वाला इससे महू नाके जाने वाले रास्ते पर पहली गली जो की जिला पंचायत के कार्यालय के पास पढ़ती है के बाद वाली गली में सीधे जाने पर आपको साईं धाम मंदिर मिलगे और वही आप को यह छत्रिया भी दिख जाएँगी |

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कृष्णपुरा की छत्रियां
शहर के वैभवशाली इतिहास का प्रतीक है कृष्णपुरा की छत्रियां। करीब 150 वर्ष पुरानी इन छत्रियों में शिवाजीराव महाराज, तुकोजीराव महाराज (द्वितीय) यशवंतराव होलकर (द्वितीय) , कृष्णाबाई होलकर और मनोरमा राजे की समाधियां हैं। इसके बाद यशवंतराव होलकर के समाधिस्थल पर भी छत्री का निर्माण कराया गया। ये सभी छत्रियां जब तेज रोशनी में नहाती हैं तो उनकी खूबसूरती देखते ही बनती है। ये छत्रियां मराठा और राजपूत स्थापत्य में निर्मित हैं। इनमें राजपरिवार के दिवंगत सदस्यों के साथ ही द्वारपाल और विभिन्न मूर्तियां भी हैं, जिनमें होलकर राज परंपरा की वेशभूषा की झलक भी दिखाई देती है। छत्रियों के शिखर, कंगूरे और मेहराबों पर आकर्षक शिल्प है। परंपरा के मुताबिक छत्रियों में शिवलिंग की स्थापना की गई हैं, साथ ही जिनकी छत्री है उनकी मूर्तियां भी लगाई गई हैं। जिसे आप तस्वीरों में देख सकते है |
छत्रियों के निर्माण की शुरुआत कृष्णाबाई की छत्री से हुआ। इसके बाद तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) और शिवाजीराव होलकर की छत्रियों का निर्माण किया गया। आजादी के बाद भी दो छत्रियां बनाई गईं।इनकी नक्काशी देखते ही बनती है जिनमे दरबान, बेल, बूटे इत्यादि है |
कृष्णाबाई के नाम पर ही 1849 में तुकोजीराव द्वितीय ने कृष्णपुरा पुल भी बनाया गया था। कृष्णाबाई को छोटी अहिल्याबाई कहा जाता है। उन्होंने ही गोपाल मंदिर और महेश्वर में घाट का अधूरा निर्माण पूरा कराया था। इस घाट के निर्माण की शुरुआत अहिल्याबाई ने की थी।
बताया जाता है कि छत्रियों के निर्माण से पहले खान नदी के किनारे यहां एक धर्मशाला और मदरसा थी। जिन्हें वहां से हटाया गया था। मदरसे को जहां स्थानांतरित किया गया था वहां अब शिवाजीराव स्कूल है। देवी अहिल्या खासगी ट्रस्ट द्वारा इतने वर्ष बाद भी भोग का ‘थाला’ (भोजन से सजी थाल) लगाया जा रहा है।a href="http://myindorecity.blogspot.com/2010/12/blog-post.html" target="_blank">वीर सावरकर मार्केट देखा सकते है | कृष्णपुरा की छत्रियो के पास में ही नंदलालपुरा की सब्जी मण्डी भी है |
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| बोलिया सरकार की छत्रिया |




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कांच मंदिर
राजवाडा

मध्यप्रदेश देश का दिल, और मध्यप्रदेश का दिल है इंदौर,वैसे मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल है मगर इंदौर का अपना महत्व है | और इंदौर का दिल है राजवाडा | राजवाडा का सोदर्य इसकी सात मंजिला भवन को देखते ही बनता है व् राजबाड़ा एकलोता ऐसा महल है जिसके प्रवेश द्वार पर ७ मंजिला है १७४७ ई. के आसपास मल्हारराव होलकर ने परिवार के निवास हेतु करीब चार लाख रुपये खर्च करके इस महल का निर्माण करवाया | मराठा शैली में निर्मित इस महल के सिंह द्वार पर दोनों तरफ पहरेदारो के लिए चौकिया थी | प्रवेश द्वार से भीतर जाते ही विशाल खुला स्थान है, जहा उत्सवों और पर्वो का आयोजन होता था | द्वार के पशिचम में गणेश हाल में होलकर नरेश दरबार लगाते थे |
राजमहल के चारो और सुर और स्वर का माधुर्य बिखेरा जाता था | इसमें से नीचे के तीन मंजिले मार्बल की बनी थीऔर बाकी ऊपर की मंजिले लकड़ी की बनी है | प्रथम तीन माजिले पत्थर (Marble) की बनी हुई राजपूत शैली की परिचायक है चौथी से लेकर सातवी मंजिल मराठाशैली की है, जिसमे काष्ठ (लकड़ी) कार्य अधिक है | स्थापत्य की द्रष्टि से राजबाड़ा मुस्लिम, राजपूत, मराठा, इतालवी स्थापत्य (Architecture) का मिश्रित रूप है | इसका दक्षिणी भाग मुग़ल स्थापत्य (Architecture) एवम पूर्वी द्वार मराठा स्थापत्य (Architecture) तथा गणेश हाल, दरबार हाल आदि फ्रेंच बैसेलिक शैली का बना है | प्रवेश द्वार की रचना हिन्दू शैली के राज़ प्रसादो की तरह है | सन १८०१ में सिन्ध्य के सेनापति सरजेराव घाटे ने राजबाड़ा जला दिया | १८१८ से १८२६ के बीच आग से बचे प्रवेश द्वार की ऊपर की ५ मंजिल पुन: ठीक की गई | इसमें होलकरो के प्रधानमंत्री तत्याजोग ने अथक योगदान दिया |
१८२६ से १८३३ के मध्य वर्तमान की पूर्ण ईमारत का निर्माण किया गया | दुर्देव ( दुर्भाग्य) से १८३४ में आग लगने से लकड़ी की बनी एक मंजिल नष्ट हो गई | १८४४ में तुकोजीराव द्वितीय को गोद लिया गया, तब होलकर वंश का १८५२ में प्रथम राजतिलक इसी भवन में हुआ | १९८४ में इसका प्रष्ठ भाग जला | अब राजवाडा को देखने के लिए आपको अपनी जेब से कुछ रूपये भी खर्च करना होंगे इसमें भरतीय व्यक्ति को देखने के लिए प्रवेश शुल्क १० रु. व् विदेशी सैलानियों को १०० रु खर्च करना होंगे इसके अतिरिक्त अगर आप कोई पिक्चर/फोटो या विडियो लेना चाहते है तो इसके लिए क्रमश: ५रु से २५० रु तक का खर्च हो सकता है | इंदौर का नाम लेते ही सबसे पहले इसी राजवाडा का चित्र हमारे मानस पटल पर उभरता है | होलकर राज़ तो अब नहीं रहा परन्तु राजवाडा आज भी राजवाडा इंदौर की शान बना हुआ है | और अपने ह्रदय में किसी युगपुरुष की भाती मालवा इतिहास संजोये हुए है |
नेहरु पार्क

दोस्तों मै आपको इंदौर के नेहरु पार्क के बारे में बताने जा रहा हू यह पार्क पहले बिस्को पार्क के नाम से जाना जाता था क्योकि इसे सर बिस्को के द्वारा बनवाया गया था होलकर राज्य में सर बिस्को गार्डेन supritendent के रूप में पदस्थ थे और उन्हें उस समय लालबाग, रेसीडेंसी उद्यान (Residency Garden ) के रखरखाव का जिम्मा सोपा गया. वे इंग्लॅण्ड (England ) के केम्ब्रिज युनिवेर्सिटी ( Cambridge University) के वनस्पति विज्ञानं विशेषज्ञ थे. पहले इस पार्क में फव्वारे भी हुआ करते थे जो कि अब नहीं है, इस पार्क में बच्चो कि एक २ बोगी कि ट्रेन भी चलाई जाती है आप लोगो ने भी कभी न कभी ट्रेन में सफ़र किया ही होगा जरुर किया होगा, वैसे ही यहाँ इस दो बोगी कि ट्रेन तो चलाया जाता है इसका किराया भी काफी कम है तो आप जब भी कभी अपने बच्चो के साथ पार्क आए तो इस रेल का सफ़र जरुर कीजियेगा यह पार्क इंदौर रेलवे स्टेशन के काफी करीब है और B.S.N.L. ऑफिस के पास में है |लालबाग
इंदौर में लालबाग की शान कुछ और ही है यहाँ कि हरियाली देखते ही बनती है |खान नदी के किनारे पर २८ एकड़ में बने राजघराने का यह लालबाग महल बाहर से तो साधारण दीखता है परन्तु भीतर से इसकी सजावट देखते ही बनती है और यही पर्यटकों को अपनी और खिचती है | इसका निर्माण सन १८८६ में महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय के राज में प्रारंभ हुआ और महाराजा तुकोजी राव होलकर तृतीय के शासन काल में संपन्न हुआ | जो तीन चरणों में पूर्ण हुआ | इस महल के सबसे निचे का तल प्रवेश द्वाकक्ष है जिसका फर्श संगमरमर से बना हुआ है यह एतिहासिक शिल्पकृति को बताता है | पहले तल पर मुस्लिम सदी के पुराने सिक्को का संग्रह है व यहाँ समकालीन भारत और इटालियन पेंटिंग्स चित्र और प्रतिमाओ का सुन्दर प्रदर्शन देखने को मिलता है | इस महल की सबसे बड़ी खासियत इसका प्रवेश द्वार है यह द्वार इंग्लॅण्ड के बर्किघम पेलेस के गेट की हुबहू प्रतिकृति है जिसे जहाज के रास्ते मुंबई लाया गया और वहा से सड़क के रास्ते इंदौर लाया गया | यह दरवाजा बीड धातु का बना है | पुरे देश में इस गेट की मरम्मत नहीं हो सकती अगर इसकी मरम्मत करवानी हो तो इसे इंग्लॅण्ड ही ले जाना पड़ेगा | इस महल के दरवाजो पर राजघराने की मुहर लगी है जिसका अर्थ है “जो प्रयास करता है वही सफल होता है ” बालरूम का लकड़ी का फ्लोर स्प्रिंग का बना है जो उछलता है, महल की रसोई से नदी का किनारा दिखता है, यहाँ रसोई से एक रास्ता भूमिगत सुरंग में भी खुलता है | सिहासन कक्ष में वर्षो तक बैठके तथा खास कार्यक्रम हुआ करते थे | १९७८ तक यह राजनिवास रहा तुकोजीराव तृतीय इस भवन के अंतिम निवासी थे | यहाँ महल अपने साथ में आज भी होलकर राज्य की शान और शाही जीवन शैली की अमित छाप लिए हुए है और अपने भीतर होलकर राज्य का स्वर्णिम इतिहास समेटे हुए है | यहाँ महल के भीतर छायाचित्र/फोटो लेना प्रतिबंधित है | यहाँ आप सुबह १० अजे से शाम को ५ बजे तक अन्दर आ सकते है |
महल के कमरों की बनावट देखते ही बनती है कमरे की दीवारों और छत पर सुन्दर कलाकृतिया दिखाई देती है यहाँ पर कारीगरी में बेल्जियम के कांच, पर्सियन कालीन, महंगे और खुबसूरत झाड़ फानूस और इटालियन संगमरमर का खुबसूरत प्रयोग किया गया है |







































