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इंदौर में सिनेमा

देश के फ़िल्मी नक़्शे में इंदौर महानगर का महत्वपूर्ण स्थान हमेशा से रहा है | तीस सिंगल स्क्रीन सिमटकर भले ही गिनती की रह गई है , पर इस घाटे को इंदौर में मल्टीप्लेक्स ने पूरा कर दिया है |

इंदौर में सिनेमा कैसे आया, इसकी भी एक अलग कहानी है | 7 जुलाई, 1896 में पेरिस से चलकर ल्युमिएर ब्रदर्स का सिनेमा बम्बई की तत्कालीन वाटसन होटल में आया था | उसके इक्कीस साल बाद 1917 में वह इंदौर आया | आज के जवाहर मार्ग पर तब वाघमारे का बाड़ा था उसी बादे में खुले आसमान के नीचे कार्बेटर की रौशनी में छोटी-छोटी गूंगी फिल्मे दर्शको को दिखाई जाती थी | सभी फिल्मे विदेशी होती थी, क्योकि भारत में फिल्म निर्माण धीमी गति से चल रहा था | कुछ छोटी फिल्मे, वृतचित्र और न्यूज़रील मिलाकर दो से ढाई घंटे का मनोरंजन पैकेज बनाया जाता था | प्रोजेक्टर हाथ से घुमाया जाता था | कभी चित्र परदे पर तेज दौड़ते नजर आते, तो कभी धीरे | दर्शको के लिए सबसे बड़ा अजूबा और चमत्कार था, चित्रों का मनुष्य की तरह चलना-फिरना | मजे कि बात यह भी थी कि वे जहा गए ही नहीं, वहा के दृश्य उनके सामने हाजिर हो जाते थे |

डबल प्रोग्राम- आज के मार्केटिंग का यह फंडा है कि एक खरीदो एक मुफ्त पाओ, लेकिन 1917 के दौर में भी सिंगल टिकट में डबल मनोरंजन होता था | सिनेमा के परदे के सामने नाचने-गाने और बजाने वाले लोगो का एक दल बैठता था | वह फिल्म के बीच बेकग्राउंड म्यूजिक का काम करता था | इंटरवल में नाचने-गाने वाले अपने हुनर से दर्शको को लुभाते थे |

हमने पहले भी एक लेख में नवीनचित्रा सिनेमाघर के बारे में बताया था जहा आप आधे टिकट का भी लुत्फ़ उठा सकते था |

अठारह महीनो के बाद नंदलालपुरा थियेटर के पास रायल सिनेमा आया, जो टेंट में दिखाया जाता था | 1918 में बोराडे का थियेटर बना | सेठ मन्नालालजी और सेठ धन्नालालजी ने मोरोपंत सावे की भागीदारी में इसे चलाया | शाम को अँधेरा होने पर इसमें दो शो होते थे | लोग जान-पहचान वालो से नजरे बचाकर फिल्म देखने जाते थे | महिलाए परदे के पीछे बैठती थी, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम होती थी |

1922 में नरहरी अडसुले ने श्रीकृष्ण टाकीज बनाई | बॉस की खपच्चियो एवं टीन की चादरों से आयताकार शक्ल का सिनेमा था श्रीकृष्ण टाकीज | बाद में इसे पक्का कराया गया | यह रिवरसाइड रोड के पास हीरा लस्सी के पास स्थित था अब इसे ध्वस्त कर दिया गया है | 23 मार्च, 1923 को धन्नालाल-मन्नालाल ने मोरोपंत सावे के साथ मिलकर रिवरसाइड रोड पर क्राउन सनेमा तैयार किया बाद में इसका नाम प्रकाश टाकीज किया गया | वर्तमान में यहाँ प्रकाश प्लाजा है | इन दोनों सिनेमाघरो में टिकट दर दो आने से एक रूपये थी | भारत कि पहली बोलती फिल्म आलमार (1931) का प्रदर्शन श्रीकृष्ण टाकीज में हुआ था | यह फिल्म तीन महीनो तक लगातार चली | इसे देखने दो सौ किलोमीटर दूर से दर्शक आते थे, क्योकि गूंगा सिनेमा अब बोलने लगा था | वी. शांताराम प्रभात फिल्म कंपनी की कई फिल्मे प्रदर्शित करने इंदौर आते और श्रीकृष्ण टाकीज में ही ठहरते थे |

इसके बाद सिनेमाघर निर्माण का सिलसिला चल पद | 1927 में किसनलाल नारसरिया ने सियागंज के मुहाने पर प्रभात सिनेमा शुरू किया | बाद में वह अरुण और बंद होने के पहले एलोरा नाम से जाना गया | एलोरा के कंधे पर अंजता भी कुछ बरसो तक सवार रहा | अब कमर्शियल काम्प्लेक्स में दोनों गम हो गए है | रीगल/डायमंड/नीलकमल (1934), महाराज (1936), मिल्की-वे (1942), सरोज (1946), भारत-नवीनचित्रा / राज (1947), स्टारलिट (1948), यशवंत (1949), अलका/ज्योति (1950), बेम्बिनो (1965), और मधुमिलन (1969) | ये मनोरंजन के प्रमुख केन्द्र हो गए थे | इसके बाद कस्तूर, प्रेमसुख, स्मृति, कुसुम, देवश्री, अभिनवश्री, अभिनयश्री, सपना, संगीता, सत्यम, अनूप, आस्था और मनमंदिर ने अपनी आधुनिक उपस्थिति तथा सुख सुविधाओ से दर्शको को लुभाया |

इंदौर में 1933 से तीन और 1956 से चार शो की परम्परा आरम्भ हुई | सिनेमाघरों में चाय-नाश्ते के केंटिन, पान बीडी की दुकाने, सायकिल-कार स्टैंड की व्यवस्था पुरानी है | इंटरवल में कुल्फी-मूंगफली-समोसे हाल के अंदर बेचने की सुविधा भी कुछ टाकीजो ने दी थी | टिकट-दर एक रूपये से पाच रूपये ( बालकनी ) बरसो तक रही | पिछले कुछ दशको में मल्टीप्लेक्स का दौर शुरू हुआ और इंदौर का पहला मल्टीप्लेक्स वेलोसिटी-||| बना | आम आदमी के सपनो का मनोरंजन दिनोदिन दूर होता गया | मल्टीप्लेक्स में पचास रूपये से लेकर पाच सौ रूपये तक के टिकट है | ये समय के अनुसार, दिन के और सितारों से सजी फिल्मो के अनुसार कम ज्यादा होते रहते है | पहले एक दिन में किसी एक फिल्म के पाच शो से ज्यादा नहीं हो पाते थे |

आपको यह लेख कैसा लगा जरुर बताइयेगा |

इंदोरी होली

Pic By Kailash Mittal

इंदौर की खूबसूरती बढ़ाने में इन्दोरियो की तासीर और रंगीन मिजाजी बहुत महत्वपूर्ण है | होली पुरे देश में जोश के साथ मनाई जाती है |

इंदौर में होली के इस धार्मिक पर्व को बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है और

इस समय पर गेर निकाली जाती है | जिसमे शहर के सभी उम्र के लोग सम्मिलित होते है चाहे वे उम्रदराज हो, जोशीले नौजवान हो या फिर बच्चे | गेर का आयोजन शुरू करने का श्रेय इन्दोर में टोरी कार्नर को जाता है जिसमे रंगों को किसी टेंकर से भरकर भीड़ पर छीटा जाता है |

इंदौर में होली के दिन सबसे पहले सरकारी होली राजबाड़ा पर जलाई जाती है जिसकी पूजा अर्चना मल्हार मार्तण्ड मंदिर के पुजारी करते है |

इंदौर में और पुरे मालवा में रंगपंचमी को मनाया जाता है जो की होली के पांच दिन बाद मनाई जाती है | जो कसर होली पर बाकी रह जाती है उसे रंगपंचमी पर पूरा किया जाता है | रंगपंचमी खासकर इंदौर, उज्जैन, मंदसोर में और इनके आसपास के इलाको में खेली जाती है |

गेर  की परंपरा १९४७ से टोरी कार्नर से शुरू हुई जिसका श्रेय बाबूलाल गिरी, छोटेलाल गिरी को दिया जा सकता है सियासी हलचल और शहर की प्रमुख गतिविधियों का केन्द्र रहे टोरी कार्नर की गेर ने रंगपंचमी की एक नयी परंपरा को जन्म दिया | हर जाती, धर्म औ हर सियासी पार्टी के नेता तथा समाज के साथ-साथ रंग उड़ाने के नए-नए अंदाज गेर में शामिल बड़ी मिसाइलो से लोगो को सराबोर करने की शुरुआत भी इस गेर के हिस्से में है |

टंट्या भील

खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में 1842 में भाऊसिंह के यहाँ एक बालक ने जन्म लिया, जो अन्य बच्चो से दुबला-पतला था | निमाड में ज्वार के पौधे को सूखने के बाद लंबा, ऊँचा, पतला होने पर ‘तंटा’ कहते है इसीलिए ‘टंट्या’ कहकर पुकारा जाने लगा |

टंट्या की माँ बचपन में उसे अकेला छोड़कर स्वर्ग सिधार गई | भाऊसिंह ने बच्चे के लालन-पालन के लिए दूसरी शादी भी नहीं की | पिता ने टंट्या को लाठी-गोफन व तीर-कमान चलाने का प्रशिक्षण दिया | टंट्या ने धर्नुविद्या में दक्षता हासिल कर ली, लाठी चलाने और गोफन कला में भी महारत प्राप्त कर ली | युवावस्था में उसे पारिवारिक बंधनों में बांध दिया गया | कागजबाई से उनका विवाह कराकर पिता ने खेती-बाड़ी की जिम्मेदारी उसे सौप दी | टंट्या की आयु तीस बरस की हो चली थी, वह गाँव में सबका दुलारा था, युवाओ का अघोषित नायक था | उसका व्यवहार कुशलता और विन्रमता ने उसे लोकप्रिय बना दिया |

बंजर भूमि में फसल वर्षा पर निर्भर होती है | प्राकृतिक प्रकोप, अवर्षा से बुरे दिन भी देखना पड़ते है | अन्नदाता किसान भी भूखा रहने को मजबूर हो जाता है | टंट्या को भी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा | पिता भी ऐसे समय नहीं रहे, भूमि का चार वर्ष का लगान भी बकाया हो गया | मालगुजार ने उसे भूमि से बेदखल कर दिया | आपके सम्मुख खाने की दिक्कत हो गयी  | ऐसे वक्त उसे ‘पोखर’ की याद आई जहा उनके पिता भऊसिंह के मित्र शिवा पाटिल रहते थे और जिन्होंने सम्मिलित रूप से जमीन खरीदी थी, जिसकी देखरेख शिवा पाटिल करते थे | शिवा पाटिल ने टंट्या का आदर-सत्कार तो किया परन्तु भूमि पर उसके अधिकार को मंजूर नहीं किया | शिवा के मुकरने के बाद टंट्या बडदा पंहुचा | मकान, बेलगाडी बेचकर कुछ नकद राशि जुटाई | खंडवा न्यायालय में शिवा की धोखाधड़ी के खिलाफ कार्यवाही की, इसमें भी आपको पराजित होना पड़ा | झूठे साक्ष्यो के आधार पर शिवा की विजय हुई |

टंट्या ने रोद्र रूप धारण कर लिया | लाठी से शिवा के नौकरों की पिटाई करके खेत पर कब्ज़ा कर लिया | उसने पुलिस में टंट्या के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई | पुलिस ने गिरफ्तार करके मुकदमा कायम किया, जिसमे उसे एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गयी | जेल में बंदियों के साथ अमानुषिक व्यवहार होता देख टंट्या विक्षुब्ध हो गया, उसके मन में विद्रोह की भावना बलवती होने लगी| जेल से छूटने के बाद पोखर में मजदूरी करके जीवन निर्वाह करने लगा, किन्तु वहा भी उसे चैन से जीने नहीं दिया गया | कोई भी घटना घटती तो टंट्या को उसमे फसा देने षड्यंत्र रचा जाता | पोखर के बजाय उसने हीरापुर में अपना डेरा जमाया, वहा चोरी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया | बिजानिया भील और टंट्या ने तलवार से कई सिपाहियों को घायल कर दिया, इस प्रकरण में उसे तीन माह की सजा हुई | बडदा-पोखर के बाद झिरन्या गाँव (खरगोन) में टंट्या रहने लगा | एक अपराधी ने चोरी के मामले में उसका नाम ले लिया, फिर से पुलिस उसे खोजने लगी | टंट्या ने बदला लेने का संकल्प लिया, उसने साहुकारो-मालगुजारो से पीड़ित लोगो का गिरोह बनाया जो लूटपाट और डाका डालता था | 30 जून, 1876 को हिम्मतसिंह जमीदार के यहाँ धावा बोला गया, हिम्मतसिंह को गोली मार दी गई | टंट्या को षडयंत्र में फसाकर उसके विश्वासपात्र साथियों के साथ गिरफ्तार करवा दिया गया| 20 नवम्बर, 1878 को खंडवा की अदालत में दौलिया और बिजौनिया के साथ पेश किया गया |

टंट्या की शोहरत उस समय बुलंदी पर थी, उसे देखने के लिए सैकडो भील जमा हो गए | हिम्मत पटेल ने टंट्या के खिलाफ गवाही दी, जिसे कोर्ट में टंट्या ने धमकाया | उसे खंडवा जेल में रखा गया, जहा से उसने फरार होने की योजना बनाई | 24 नवम्बर, 1878 की रात में बीस फीट ऊँची दीवार फांदकर वह 12 साथियों के साथ जंगल की दिशा में भाग गया |

टंट्या एक गाँव से दूसरे गाँव घूमता रहा | लोगो के सुख-दुःख में सहयोगी बनने लगा | गरीबो की सहायता करना, गरीब कन्याओ की शादी कराना, निर्धन व असहाय लोगो की मदद करने से ‘टंट्या मामा’ सबका प्रिय बन गया | वह शोषित-पीड़ित भीलो का रहनुमा बन गया, उसकी पूजा होने लगी |

राजा की तरह उसका सम्मान होने लगा | सेवा और परोपकार की भावना में उसे ‘जननायक’ बना दिया | उसकी शक्ति निरंतर बढ़ने लगी | युवाओ को उसने संगठित करना शुरू कर दिया | टंट्या का नाम सुनकर साहूकार कांपने लगे |

पुलिस ने टंट्या को गिरफ्तार करने के लिए विशेष दस्ता बनाया, जिसमे दक्ष पुलिस वालो को रखा गया | ‘टंट्या पुलिस’ ने कई जगह छापे मारे, किन्तु टंट्या पकड़ में नहीं आया | सन 1880 में टंट्या ने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया, जब उसने चौबीस गाँवों में डाके डाले, भिन्न-भिन्न दिशाओं और गाँवों में डाके डाले जाने से टंट्या की प्रसिद्धि चमत्कारी महापुरुष की तरह हो गई |

डाके से प्राप्त जेवर, अनाज, कपडे वह गरीबो को दे देता था | पुलिस ने टंट्या के गिरोह को खत्म करने के लिए उसके सहयोगी बिजानिया को पकडकर फांसी दे दी, जिससे टंट्या की ताकत घट गयी |

टंट्या को गिरफ्तार करने के लिए इश्तिहार छापे गए, जिसमे इनाम घोषित किया गया | टंट्या को पकडने के लिए इंग्लेंड से आए नामी पुलिस अफसर की नाक टंट्या ने काट दी | सन 1888 में टंट्या पुलिस और मालवा भील करपस भूपाल पल्टन ने उसके विरुद्ध सयुक्त अभियान चलाया | टंट्या का प्रभाव मध्यप्रांत, सी-पी क्षेत्र, खानदेश, होशंगाबाद, बैतुल, महाराष्ट्र के पर्वतीय क्षेत्रो के अलावा मालवा के पथरी क्षेत्र तक फ़ैल गया | टंट्या ने अकाल से पीड़ित लोगो को सरकारी रेलगाड़ी से ले जाया जा रहा अनाज लूटकर बटवाया | टंट्या मामा के रहते कोई गरीब भूखा नहीं सोयेगा, यह विश्वास भीलो में पैदा हो गया था |

टंट्या ने अपने बागी जीवन में लगभग चार सौ डाके डाले और लुट का माल हजारों परिवारों में वितरित किया | टंट्या अनावश्यक हत्या का प्रबल विरोधी था | जो विश्वासघात करते थे, उनकी नाक काटकर दंड देता था | टंट्या का कोप से कुपित अंग्रेजो और होलकर सरकार ने निमाड में विशेष अधिकारियो को पदस्थ किया | जाबाज, बहादुर साथियों-बिजानिया, दौलिया, मोडिया, हिरिया के न रहने से टंट्या का गिरोह कमजोर हो गया |

पुलिस द्वारा चारो तरफ से उसकी घेराबंदी की गई | भूखे-प्यासे रहकर उसे जंगलो में भागना पड़ा | कई दिनों तक उसे अन्न का एक दाना भी नहीं मिला | जंगली फलो से गुजर करना पड़ा | टंट्या ने इस स्थिति से उबरने के लिए बनेर के गणपतसिंह से संपर्क साधा जिसने उसकी मुलाकात मेजर ईश्वरी प्रसाद से पातालपानी (महू) के जंगल में कराई, किन्तु कोई बात नहीं बनी |

11 अगस्त, 1896 को श्रावणमास की पूर्णिमा के पावन पर्व पर जिस दिन रक्षाबंधन मनाया जाता है, गणपत ने अपनी पत्नी से राखी बंधवाने का टंट्या से आग्रह किया | टंट्या अपने छह साथियों के साथ गणपत के घर बनेर गया | आवभगत करके गणपत साथियों को आँगन में बैठाकर टंट्या को घर में ले गया, जहा पहले से ही मौजूद सिपाहियों ने निहत्थे टंट्या को दबोच लिया | खतरे का आभास पाकर साथी गोलिया चलाकर जंगल में भाग गए | टंट्या को हथकड़ीयो और बेड़ियों में जकड दिया गया | कड़े पहरे में उसे खंडवा से इंदौर होते हुए जबलपुर भेजा गया | जहा-जहा टंट्या को ले जाया गया, उसे देखने के लिए अपार जनसमूह उमडा | 19 अक्टूम्बर, 1889 को टंट्या को फांसी की सजा सुनाई गयी |

1857 की क्रांति के बाद टंट्या भील अंग्रेजो को चुनौती देने वाला ऐसा जननायक था, जिसने अंग्रेजी सत्ता को ललकारा | पीडितो-शोषितों का यह मसीहा मालवा-निमाड में लोक देवता की तरह आराध्य बना, जिसकी बहादुरी के किस्से हजारों लोगो की जुबान पर थे | बारह वर्षों तक भीलो के एकछत्र सेनानायक टंट्या के कारनामे उस वक्त के अखबारों की सुर्खिया होते थे | गरीबो को जुल्म से बचाने वाले जननायक टंट्या का शव उसके परिजनों को सौपने से भी अंग्रेज डरते थे | टंट्या को फांसी दी गयी या गोली मारी गई, इसका कोई सरकारी प्रमाण नहीं है, किन्तु जनश्रुति है कि पातालपानी के जंगल में उसे गोली मारकर फेक दिया गया था | जहा पर इस ‘वीर पुरुष’ की समाधि बनी हुई है वहा से गुजरने वाली ट्रेन रूककर सलामी देती है | सैकडो वर्षों बाद भी ‘टंट्या भील’ का नाम श्रद्धा से लिया जाता है | अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ बगावत करने वाले टंट्या का नाम इतिहास के पृष्ठों में स्वर्णाक्षरो से अंकित है |

गांधीजी की घडी

अमेरिका में नीलामी के पश्चात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पांच निशानियां विजय माल्या ने खरीद ली हैं यह सब आप लोग तो जानते ही होंगे। इनमें एक जेब घड़ी भी शामिल है, जो इंदौर में बनी थी। घड़ी निर्माता एम. एम. कस्तूरे ने 11 जून 1947 को यह घड़ी गांधी जी को भेंट की थी।

स्वर्गीय कस्तूरे के पुत्र मुकुंद कस्तूरे ने बताया कि उनके पिता को घड़ी बनाने में महारत हासिल थी। उन्होंने इंदौर में ‘उद्यम’ नाम से घड़ियां बनाने का कारखाना शुरू किया था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर कस्तूरे ने पहली जेब घड़ी बनाई जो शायद देश की पहली हस्तनिर्मित घड़ी थी। उन्होंने यह घड़ी महात्मा गांधी को 1935 में उस वक्त दिखाई थी, जब वह मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति द्वारा आयोजित हिंदी सम्मेलन में भाग लेने इंदौर आए थे।

60 वर्षीय मुकुंद कस्तूरे ने बताया कि हिंदी अंकों वाली यह पहली हस्तनिर्मित घड़ी थी। गांधी जी जिस घड़ी को कमर में लटका कर रखते थे, वह 1947 में पटना से दिल्ली जाते वक्त खो गई थी। यह खबर अखबारों के जरिए जब उनके पिता को पता चली तो उन्होंने गांधी जी को इंदौर से दिल्ली टेलीग्राम कर अपने ट्रेडमार्क उद्यम की घड़ी उन्हें भेंट करने की इच्छा जाहिर की।

मुकुंद ने बताया कि उनके पिता की यह इच्छा 11 जून 1947 को पूरी हो गई जब उन्होंने चांदी के केस में जेब घड़ी और एक हस्तनिर्मित टेबल घड़ी बापू को भेंट की। इस घड़ी के अंक हिंदी में थे। बापू की शहादत के दिन 30 जनवरी 1948 तक यही घड़ी उनके पास थी।

मुकुंद ने बताया कि उनके पिता ने देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद और द्वितीय राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भी हस्तनिर्मित घड़ियां भेंट की थीं। मुकुंद ने प्रसिद्ध उद्योगपति विजय माल्या द्वारा बापू की निजी वस्तुएं अमेरिका में नीलामी से खरीदकर स्वदेश वापस लाने पर खुशी जताई।

इंदौर में महात्मा गांधी

इंदौर में महात्मा गांधी पहली बार 29 मार्च 1918 में हिंदी साहित्य समिति के मानस भवन का शिलान्यास और दूसरी बार 20 अप्रैल 1935 में इसी भवन का उद्घाटन करने आए थे। समिति की स्थापना बापू की ही प्रेरणा से 1910 में हो गई थी।
समिति द्वारा 1918 में हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन के आठवें अधिवेशन की अध्यक्षता गांधीजी ने की थी। समिति की जानकारी के मुताबिक सम्मेलन में आने से पहले उन्होंने समिति के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. सरजूप्रसाद तिवारी को एक पत्र लिखकर कुछ सवालों के उत्तर राष्ट्र से पूछने को कहा था।
बापू के ही शब्दों में : भाई सरजूप्रसादजी, आप इन दो प्रश्नों के उत्तर मान्य पुरुषों से तथा विद्वानों से मंगाकर रख छोड़ना ये दो प्रश्न हैं- हिंदी राष्ट्रभाषा होना चाहिए या नहीं, हमारी मातृभाषाओं में सर्वशिक्षा देना सही है या नहीं। गांधीजी की आज्ञा के मुताबिक लोगों से पूछा गया और इसी आधार पर उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की समिति की मांग का समर्थन किया था। बाद में संविधान निर्माताओं ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकृति दी।
शिलान्यास के दौरान महात्मा गांधी काठियावाड़ी वेशभूषा में आए थे। इस दौरान उनकी काठियावाड़ी पगड़ी आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी। सन् 1935 में महात्मा गांधी तीन दिन शहर में रहे थे। 20 से 23 अप्रैल तक वे यहां ठहरे थे। इस दौरान समिति का 24वां हिंदी साहित्य सम्मेलन हुआ था जिसमें गांधीजी सभापति थे। उस वक्त के बिस्को पार्क (नेहरू पार्क) में आयोजित सम्मेलन गांधीजी ने फिर राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की तरफदारी की थी।
सम्मेलन में महाराजा यशवंतराव होलकर ने इंदौर में हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की थी। समिति में महात्मा गांधी यातायात की परवाह किए बिना बैलगाड़ी में बैठकर आए थे।
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बाते इन्दोरी स्टाइल में

इंदौर के बारे में तो बाते चली रहेगी चलिए आज आपको इन्दोरी भाषा के बारे में बताते है एक अच्छे लेखक है जवाहर चौधरी उनका लेख आपको प्रस्तुत कर रहा हू वैसे इंदौर कि भाषाभी उसी तरह से अलग है जिस तरह से मुंबई कि वहा अपुन-तपुन चलता है तो यहाँ अलग ही स्टाइल चलती है कुछ खास सब्दो को विशेषकर “हे कि नी भिया ” ज्यादा बार बोला जाता है हे कि नी भिया तो फिर पढ़िए दो इन्दोरियो का वार्तालाप इन्दोरी स्टाइल में

‘वो क्या है भिया, आपने कभी राजनीती में जाने का सोची-नी, नी तो आज कि डेट में अपन को टिकिट हस के देते सारी पारटी वाले |’
‘नई यार !!’
‘अपने लिए कोई मुश्किल नी था भिया | आज देखो क्या माहोल चल रिया है ! जो देखो जो भगा चला-जा रिया है दिल्ली-भौपाल ! फिर भी किसी कि दाल नी-गल-री है | पन अपनी बात ठप्पे से होती | क्या…’
‘वा-यार पेलवान ! झाकी थी क्या तुमारी !!’
‘केने को तो सब केते रेते है, पन उस्ताद एक तेम पे अपना वो जलवा था कि पुछोई मत | वो हे न पनवारीलाल, जो बाद में मंत्री-यंत्री बन गया था, अपने हात-पैर दबाता था, क्या… |’
‘ऍ !! क्या केरे हो ! सई में !’
‘ हां-हां, वोई तो कर हू, उस टेम पे जलवा था अपना | आपने देखा नी उस्ताद, नी-तो आप भी बिस्वास नी करते, क्या…!’ ‘ एक बात हे यार, गलती कर दी तुमने | राजनीती में चले जाते तो आप कि तारीफ़ में फावड़े से माल खिंच रे होते | हे कि-नी?’
 ’वो क्या हे भिया, साली अपने मेई ईमानदारी हे | अपने को उसी टेम पे समज में आ गई थी आगे चलके कोई ईमानदारी से राजनीती नी कर सकता हे  | और भिया फिरापने को क्या करना हे ! दाल रोटी उस टेम पे भी भगवान् देई रिया था, हे कि नी ?
‘देखो पेलवान, दाल रोटी तो मांगते भिकारियो को भी मिल जाती है | ऐसी इमानदारी जाए ताड़ी में | बेवकूफ समजते हे लोगबाग़ आज के जमाने में इमानदार को | आज कि डेट में तुमको कुछ मिल रिया हे क्या ईमानदारी का ?!’
‘नी मिले तो नी मिले यार, अब क्या करो जब खून मेई ईमानदारी हे तो !’
‘उस टेम पे तो कुछ कर लेते यार तो पनवारिलाल कि तरे ऐस करते ठप्पे से |… पता हे कि नी ! कित्ता माल बना लिया हे पठ्ठे ने !?… चार-चार तो बंगले हे इसी सैर में !… भोत सारी कालोनी हों में पलाट है ढेर सारे ! और केस!.. मने नगद तो इत्ता हे कि बस पुछोई मत ! … उदार लम्बे रूट पे बस ओन चल री हे उनका तो हिसाबी-नी हे !…. और भी भोत सारे उलटे-सिदे धंदे हे वो अलग | चुक गए पेलवान |’
‘अब क्या करो भिया | अपने को तो येई संतोस हे कि नेतागिरी में मु कला नी करा अपन ने | चायते तो कुछ भी कर सकते थे.. भिया तुम बिस्वास नी करोगे एक बार तो नेहरूजी से यु आमना-सामना हुआ, पाच-छे फुट कि दुरी से |’
‘नई यार !! क्या बात कर रियो हो !!’
‘हा, सई में | इदर कालेज के सामने से निकले थे | अपन तो बाप के कंदे पे बेठे थे तो अलग सेई दिखरे थे उनको | …. अपन को देखते सेई उन्ने गाड़ी मद्दी कराई और गेंदे का हार फेका मेरे उप्पर |…पन सेल दुसरे लोग होन ने झपट लिया |.. तबी से अपन को समज में आ गई कि राजनीती में येई होअगा यार |….माल अपने नाम पे आएगा और लुट लेंगे दुसरे लोग !.. बस अपना मन ऐसा खट्टा हो गया कि पूछो मत …. आज तक खट्ठाई हे.. चइए जब दी में जावन लगा लों |’
‘वा यार पेलवान ! ऐसी इमानदारी अगर नेता होन में आ जाये तो देस सुदर जाये क्या |’
‘देस कि किस्मत में जो लिखा होएगा वोई तो होएगा न भिया, अपन क्या कर सकते हे!?’
‘…फिर अबकी चुनाव में किसका काम क

रोगे?’

‘जो सई आदमी होता हे भिया अपन तो उसी का काम करते हे, क्या…|’
‘आज के टेम में कोई सई आदमी मिल्रिया हे क्या!?’
‘सई के रे हो भिया, पन करो क्या… हे कि नी?’
‘तुम बी यार, उस टेम पे लग लिए होते तो आज ये दिन नी देखना पड़ते |…पारसद-वारसद तो बनी जाते | कम से कम अल्फ़त्तुओ के झंडे-डंडे तो नी उठाना पड़ते |’
‘सई के रे भिया | पर करो क्या यार … ईमानदारी ने मरवा दिया |’
हा तो भिया समझ में आया…. बढ़िया लेख था | हे कि नी !!!

और अब देखिये इस मालवी इन्दोरी भाषा को दुनिया भर में फ़ैलाने वाले राजीव नेमा जी का एक विडियो

महारानी उषाराजे स्टेडियम- इंदौर

महारानी उषाराजे स्टेडियम. जी हा वही जो कुछ साल पहले ही बनकर तैयार हुआ है. पहले इंदौर में नेहरु स्टेडियम में अन्तराष्ट्रीय मैच हुआ करते थे मगर उस मैदान के छोटे होने के कारण एक और नया स्टेडियम बनाया गया और उसका नाम इंदौर की होलकर रानी महारानी उषाराजे के नाम पर रखा गया. इस मैदान पर पहला अन्तराष्ट्रीय वन डे मेच २००६ में खेला गया. अन्तराष्ट्रीय मैचो के अलावा भी यहाँ कई घरेलु मैचो को खेला जाता है बल्कि यह मध्य प्रदेश क्रिकेट टीम का घरेलु मैदान है. इस मैदान का अधिकार व् रखरखाव मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएसन (M. P. C. A.) करती है. यहाँ पहला अन्तराष्ट्रीय मैच १५ अप्रैल, २००६ को भारत और इंग्लॅण्ड के बीच खेला गया और भारत ने उस मैच को ५-१ से जीता था. इस मैदान की बैठक क्षमता अपेक्षाकृत कम है शायद इसलिए की इसे बने ज्यादा समय नहीं हुआ है. इस मैदान पर पहुचने के लिए निकटतम एयरपोर्ट देवी अहियाबाई होलकर एयरपोर्ट है जो की इस मैदान से ६.५०८ किलोमीटर की दुरी पर है 

फ़िलहाल यहाँ पर 8 अक्टूम्बर, २०१० से इंडिया ग्रीन और इंडिया ब्लू के मध्य मैच चल रहे है. 
और आखिर में एक और बात बताना चाहूँगा M.P.C.A. की बैठक में दिनांक ११-१०-२०१० को निर्णय लिया गया और  इस स्टेडियम का नाम बदलकर होलकर स्टेडियम कर दिया गया.
इस मौके पर वहा युवराज सिंह भी मौजूद थे उन्होंने कहा “This stadium has been lucky for me and I hope to repeat my earlier performances here.” ” यह स्टेडियम मेरे लिए लकी है और में यहाँ मेरे पिछले प्रदशनो को दोहराना चाहूँगा.”
इस समय मौजूद M.P.C.A.  चेयरमेन और Union Minister of State for Commerce and Indusry ज्योतिरादित्य  सिंधिया ने कहा :” यह एक एतिहासिक मैदान है जहा सी के नायडू और कई अन्य अन्तराष्ट्रीय खिलाडियों ने  उम्दा प्रदशन किया  है 

नवीन चित्रा सिनेमाघर

आपमें से बहुत से लोगो ने नवीन चित्रा सिनेमाघर का नाम सुना भी होगा और नहीं भी, पर में आप लोगो को बता दू नवीन चित्रा सिनेमा मल्हार गंज में था और यह कई इलाको से घिरा हुआ था जैसे बर्तन बाज़ार, सराफा बाज़ार, कपडा मार्केट इत्यादि. इस कारण यहाँ के लोग शहर के दूसरी और फिल्म देखने नहीं जाते थे और कोई भी फिल्म हो शहर से बहार जाने से पहले यहाँ जरुर रूकती और करीब ७ दिनों तक यहाँ चलती.
      आपको एक दिलचस्प बात और बता हु शायद यह एकलोता  ऐसा सिनेमाघर था जहा पर अददा सिस्टम चलता था. आप जानते है हमें फिल्म देखने के लिए एक टिकेट दिया जाता है जिसमे दो पार्ट होते है इस सिनेमा में अगर आपको इंटरवल के बाद की फिल्म देखनी है तो आप किसी से भी उस समय की कीमत पर अददा खरीद कर फिल्म देख सकते थे और यदि आपने इंटरवल के बाद की फिल्म देख राखी है और पहले की फिल्म देखना है तो आप टिकट खरीद कर इंटरवल में उसे बेच सकते थे

इंदौर

हेलो दोस्तों,  आप लोगो को पता है इंदौर का नाम कैसे इंदौर हुआ, वास्तव में इंदौर का नाम पहले इन्दुर था जो की मराठो द्वारा बनाये गए इन्द्र भगवन के मंदिर (सन १७४१)  जो की कृष्णपुरा की छत्रियो में है,  के नाम पर पड़ा ! और हां आप लोगो को इस शहर के बारे में और कुछ भी बताना चाहता हूँ इंदौर मध्य प्रदेश की industrial capital है और इंदौर के बारे में कुछ खास बाते है:
  • इंदौर में चिड़ियाघर में एक सीमेंट का बना बड़ा bat  है जो की भारत की westindies के खिलाफ जीत के उपलक्ष्य में बनाया गया था सन १९७१ में !
  • राजबाड़ा एकलोता ऐसा महल है जिसका intrance  गेट पर ७ मंजिला है
  • यहाँ बड़ा गणपति की मूर्ति है जो की सबसे उची है ४० फीट की 
  • इंदौर एकलोता ऐसा शहर है जहा IIM और IIT दोनों है